खरसिया :- श्रीमदभागवत कथा के सप्तम दिवस कथा पंडाल भक्तिमय वातावरण से सराबोर रहा। कथा व्यास आचार्य मृदुल कृष्ण गोस्वामी जी महाराज ने भगवान श्रीकृष्ण की विभिन्न लीलाओं का वर्णन करते हुए सत्य, भक्ति, धर्म, नैतिकता और जीवन के मूल्यों पर विस्तार से प्रकाश डाला। कथा के दौरान उन्होंने कहा कि सत्य को कुछ समय के लिए छिपाया जा सकता है, लेकिन उसे मिटाया नहीं जा सकता। सत्य के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति परेशान हो सकता है, लेकिन अंततः उसे पराजित नहीं किया जा सकता।

कथा श्रवण के लिए मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की धर्मपत्नी कौशल्या साय , बृजमोहन अग्रवाल (सांसद, रायपुर लोकसभा एवं पूर्व मंत्री, छत्तीसगढ़ शासन) तथा डॉ. रामप्रताप सिंह (अध्यक्ष, छत्तीसगढ़ भवन एवं अन्य सन्निर्माण कर्मकार कल्याण मंडल) सहित अनेक श्रद्धालु उपस्थित रहे।
स्यमन्तक मणि की कथा से सत्य की महिमा का संदेश
आचार्य ने स्यमन्तक मणि की कथा का विस्तार से वर्णन करते हुए बताया कि साधारण मनुष्य की बात तो दूर, स्वयं भगवान श्रीकृष्ण पर भी स्यमन्तक मणि चोरी करने और प्रसेन की हत्या करने का आरोप लगा था। सत्राजित ने अपनी शंका के आधार पर भगवान श्रीकृष्ण पर यह आरोप लगाया।

भगवान श्रीकृष्ण ने सत्य को सामने लाने के लिए स्वयं मणि की खोज की और उसे प्राप्त कर सत्राजित के समक्ष प्रस्तुत किया। इस प्रसंग के माध्यम से आचार्य ने बताया कि सत्य को प्रमाणित होने में समय लग सकता है, लेकिन अंततः सत्य की ही विजय होती है।
उन्होंने कहा कि जीवन में परिस्थितियां चाहे कितनी भी विपरीत क्यों न हों, मनुष्य को सत्य का मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए। कथा पंडाल में इस प्रसंग के उपरांत “सत्यमेव जयते” के भाव के साथ श्रद्धालुओं ने भगवान श्रीकृष्ण का जयघोष किया।

भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का हुआ विस्तार से वर्णन
कथा के दौरान आचार्य श्री ने भगवान श्रीकृष्ण द्वारा भौमासुर के संहार और उसके बंधन से सोलह हजार एक सौ कन्याओं को मुक्त कराने की कथा सुनाई। इसके साथ ही ऊषा-अनिरुद्ध विवाह की सुंदर कथा का भी भावपूर्ण वर्णन किया गया।
उन्होंने द्विविद नामक वानर के वध की कथा तथा भगवान बलराम जी की वीरता का प्रसंग सुनाया। इसके अलावा भीम और जरासंध के युद्ध तथा जरासंध के जन्म की कथा का भी विस्तार से वर्णन करते हुए श्रद्धालुओं को धर्म और अधर्म के बीच के अंतर को समझाया।
“सुदामा निर्धन हो सकते हैं, लेकिन दरिद्र नहीं”
सप्तम दिवस की कथा का सबसे भावपूर्ण प्रसंग सुदामा चरित्र रहा। आचार्य मृदुल कृष्ण गोस्वामी जी महाराज ने कहा कि निर्धनता और दरिद्रता में बहुत अंतर है। सुदामा जी निर्धन हो सकते हैं, लेकिन वे दरिद्र नहीं थे।
उन्होंने समझाया कि धन का अभाव किसी व्यक्ति को दरिद्र नहीं बनाता। सच्ची संपन्नता व्यक्ति के संस्कार, चरित्र, संतोष, धर्म और भक्ति में होती है। भगवान श्रीकृष्ण के लिए भक्त की आर्थिक स्थिति कोई मायने नहीं रखती। वे गरीब और धनवान के बीच भेद नहीं करते, बल्कि भक्त की भावना और उसके समर्पण को महत्व देते हैं।
सुदामा चरित्र के माध्यम से आचार्य ने बताया कि सुदामा जी भगवान श्रीकृष्ण के बालसखा होने के बावजूद उनसे अपनी गरीबी दूर करने के लिए कुछ मांगने नहीं गए। उनके पास देने के लिए बहुत कुछ नहीं था, फिर भी वे प्रेम और श्रद्धा से पोहा लेकर भगवान श्रीकृष्ण के पास पहुंचे।
भगवान श्रीकृष्ण ने सुदामा के प्रेम को स्वीकार किया और उनकी भावना को सर्वोच्च महत्व दिया। इस प्रसंग से यह संदेश मिलता है कि भक्ति किसी लेन-देन का माध्यम नहीं है। सच्ची भक्ति में स्वार्थ नहीं, बल्कि प्रेम और समर्पण होता है।
भक्ति, कर्म और धर्म का सुंदर संदेश
आचार्य ने कहा कि जीवन में मनुष्य को अपने अच्छे कर्मों पर विश्वास रखना चाहिए। भगवान अपने भक्तों की भावनाओं और कर्मों का उचित फल प्रदान करते हैं। भक्ति को किसी सांसारिक वस्तु के बदले में व्यापार की तरह नहीं किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि सुदामा जी ने भगवान श्रीकृष्ण से कुछ नहीं मांगा। अपनी विपन्न परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने अपने पास उपलब्ध पोहे को प्रेमपूर्वक भगवान को अर्पित किया। भगवान श्रीकृष्ण ने भी उनकी निःस्वार्थ भक्ति और प्रेम से प्रसन्न होकर उनके परिवार की आवश्यकताओं को पूरा किया।
सुदामा चरित्र के माध्यम से आचार्य ने धर्म, नैतिक कर्तव्य, संस्कार और समाज में आध्यात्मिक चेतना के प्रसार का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि व्यक्ति की वास्तविक संपन्नता केवल धन-दौलत से नहीं, बल्कि उसके चरित्र, संस्कार, संतोष और भक्ति से निर्धारित होती है।
भजनों पर झूम उठा पूरा कथा पंडाल
कथा के दौरान जैसे ही भक्ति गीतों और भजनों का क्रम शुरू हुआ, पूरा पंडाल भक्तिरस में डूब गया। श्रद्धालुओं ने एक स्वर में “राधे-राधे” का जयघोष किया।
“बांके बिहारी लाल तेरी जय होवें, मेरे बांके बिहारी लाल तेरी जय होवें”,
“सुन बरसाने वाली, गुलाम तेरो बनवारी”,
“आज ब्रज में होली रे रसिया”
सहित लड्डू होली और फूल होली उत्सव से जुड़े सुंदर भजनों पर श्रद्धालु भाव-विभोर होकर झूमने और नृत्य करने लगे।
पूरे कथा पंडाल में भक्ति और उल्लास का अद्भुत वातावरण देखने को मिला। श्रद्धालुओं के जयघोष और भजनों की मधुर धुनों से वातावरण पूरी तरह कृष्णमय हो गया।
सप्तम दिवस की कथा ने श्रद्धालुओं को यह संदेश दिया कि सत्य का मार्ग कठिन हो सकता है, लेकिन उसकी विजय निश्चित है; वहीं धन से अधिक महत्वपूर्ण व्यक्ति का चरित्र, संतोष, संस्कार और भगवान के प्रति उसकी निःस्वार्थ भक्ति है।

