खरसिया :- विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर खरसिया ब्लॉक के बगबुडवा सूंती स्थित बड़ा देव ठाना में रविवार को आदिवासी समाज की संस्कृति, परंपरा, अस्मिता और सामाजिक एकजुटता का जीवंत नजारा देखने को मिला। गोंडी धर्म-संस्कृति संरक्षण समिति एवं छत्तीसगढ़ गोंडवाना संघ युवा प्रभाग के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित समारोह में बड़ी संख्या में समाजजन शामिल हुए। पारंपरिक रीति-रिवाजों, पूजा-अर्चना और सामाजिक संदेशों के बीच आयोजित कार्यक्रम ने आदिवासी समाज की सांस्कृतिक विरासत और प्रकृति के प्रति उसकी गहरी आस्था को रेखांकित किया।

बड़ा देव की पूजा-अर्चना से हुआ कार्यक्रम का शुभारंभ
समारोह की शुरुआत आदिवासी समाज के आराध्य बड़ा देव की विधिवत पूजा-अर्चना और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ की गई। पूजा के दौरान समाज की प्राचीन परंपराओं और सांस्कृतिक मान्यताओं की झलक देखने को मिली। उपस्थित समाजजनों ने अपनी धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं को आगे बढ़ाने तथा आने वाली पीढ़ियों को इससे जोड़ने का संकल्प लिया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता घनश्याम सिंह जगत ने की। वहीं प्रांतीय संयोजक महेत्तर सिंह नेताम तथा जिलाध्यक्ष आनंद सिंह जगत सहित समाज के अनेक पदाधिकारी और समाजजन प्रमुख रूप से उपस्थित रहे।

पदाधिकारियों और समाजजनों की रही उल्लेखनीय सहभागिता
समारोह में गोंडवाना गोंड महासभा के संरक्षक यशवंत राज सिंह तामपुर (रायगढ़), पेंशनर संरक्षक बसंत सिंह ठाकुर (रायगढ़), उपाध्यक्ष तारकेश्वर दीवान (कछार), हसपुर गुड़ी सचिव मोतीलाल नेताम, पेंशनर एवं सर्किल अध्यक्ष कछार भोला सिंह ठाकुर, बैंसपाली सदस्य बुधेश्वर सिदार, युवा अध्यक्ष तामपुर गुड़ी दिलीप कुमार पोर्ते, सर्किल अध्यक्ष भातपुर रोहित कुमार नैनी, भातपुर सदस्य काला सिदार, हरदीझरिया सदस्य गणेश राम जगत, खुशीलाल जगत, भातपुर सदस्य मान सिंह सिदार एवं पेंसर सदस्य बोधन सिदार सहित बड़ी संख्या में समाजजन मौजूद रहे।
समाज के विभिन्न क्षेत्रों से पहुंचे पदाधिकारियों और सदस्यों की मौजूदगी ने कार्यक्रम को सामाजिक एकता और सामूहिक सहभागिता का स्वरूप प्रदान किया। आयोजन के दौरान समाज के लोगों ने एक-दूसरे से संवाद करते हुए अपनी सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक जिम्मेदारियों को लेकर विचार साझा किए।
जल-जंगल-जमीन आदिवासी जीवन दर्शन की पहचान
समारोह को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि आदिवासी समाज की पहचान केवल उसकी वेशभूषा, नृत्य, गीत और लोक परंपराओं तक सीमित नहीं है। जल, जंगल और जमीन के साथ आदिवासी समाज का संबंध उसके जीवन, संस्कृति और अस्तित्व से जुड़ा हुआ है। प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी आदिवासी जीवन दर्शन का अभिन्न हिस्सा रहे हैं।
वक्ताओं ने कहा कि वर्तमान समय में आधुनिक शिक्षा और विकास के साथ आगे बढ़ना जरूरी है, लेकिन विकास की दौड़ में अपनी भाषा, बोली, संस्कृति, परंपराओं और सामाजिक मूल्यों को पीछे नहीं छोड़ा जाना चाहिए। अपनी जड़ों से जुड़े रहकर ही समाज अपनी विशिष्ट पहचान को मजबूत बनाए रख सकता है।
युवाओं को शिक्षा के साथ संस्कृति से जुड़ने का आह्वान
कार्यक्रम में युवा पीढ़ी की भूमिका को विशेष महत्व दिया गया। वक्ताओं ने कहा कि किसी भी समाज के भविष्य की दिशा उसकी युवा पीढ़ी तय करती है। ऐसे में युवाओं को आधुनिक शिक्षा और रोजगार के अवसरों के साथ अपनी संस्कृति और इतिहास की जानकारी भी होनी चाहिए।
युवाओं से नशामुक्ति, शिक्षा के प्रसार, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ जागरूकता फैलाने का आह्वान किया गया। वक्ताओं ने कहा कि यदि युवा अपने पूर्वजों के इतिहास, परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों को समझेंगे तो समाज की गौरवशाली विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित तरीके से पहुंचाया जा सकेगा।
सिर्फ आयोजन नहीं, सामाजिक संकल्प का मंच बना विश्व आदिवासी दिवस
बगबुडवा सूंती के बड़ा देव ठाना में आयोजित विश्व आदिवासी दिवस समारोह महज सांस्कृतिक आयोजन बनकर नहीं रहा, बल्कि यह आदिवासी अस्मिता, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक संरक्षण की सामूहिक अभिव्यक्ति के रूप में सामने आया।
समारोह में समाजजनों ने गोंडी धर्म-संस्कृति के संरक्षण, आदिवासी परंपराओं को आगे बढ़ाने, प्रकृति की रक्षा करने, सामाजिक एकता मजबूत करने तथा नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का संकल्प लिया।
कार्यक्रम ने यह संदेश भी दिया कि आधुनिकता और विकास के साथ कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ते हुए अपनी पहचान, संस्कृति और परंपराओं को संरक्षित रखना भी समाज की उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी है। बगबुडवा के बड़ा देव ठाना में उमड़ा समाज का उत्साह इसी सांस्कृतिक चेतना और सामूहिक एकता की तस्वीर पेश करता नजर आया।

