रायगढ़ :- समग्र शिक्षा विभाग रायगढ़ द्वारा शाला प्रबंधन समिति (School Management Committee-SMC) के गठन को लेकर महज 24 घंटे के भीतर जारी किए गए दो अलग-अलग आदेशों ने पूरे शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर 4 अगस्त 2026 को शासन के निर्देशों का हवाला देते हुए जिले के सभी शासकीय विद्यालयों में नई शाला प्रबंधन समिति के गठन के आदेश जारी किए गए, वहीं अगले ही दिन 5 अगस्त 2026 को उसी आदेश के क्रियान्वयन पर आगामी आदेश तक रोक लगा दी गई। इस अचानक हुए फैसले ने अधिकारियों, शिक्षकों और अभिभावकों के बीच असमंजस की स्थिति पैदा कर दी है।
जानकारी के अनुसार, 4 अगस्त को जिला मिशन समन्वयक, समग्र शिक्षा रायगढ़ द्वारा सभी विकासखंड शिक्षा अधिकारियों (BEO) एवं विकासखंड स्रोत समन्वयकों (BRC) को पत्र जारी कर शासन के निर्देशानुसार जिले के सभी शासकीय विद्यालयों में नई शाला प्रबंधन समिति का गठन तत्काल करने के निर्देश दिए गए थे। आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया था कि दो दिनों के भीतर समिति गठन की जानकारी जिला कार्यालय को उपलब्ध कराई जाए।
इस आदेश के बाद कई विद्यालयों में समिति गठन की प्रक्रिया शुरू हो गई। अभिभावकों को सूचना दी गई, बैठकों की तैयारियां प्रारंभ हुईं और संबंधित अधिकारी भी शासन के निर्देशों के पालन में जुट गए। लेकिन 5 अगस्त को अचानक जारी हुए नए आदेश में 4 अगस्त के निर्देशों के क्रियान्वयन पर आगामी आदेश तक रोक लगा दी गई। इस फैसले के बाद पूरे मामले को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि शासन के निर्देश स्पष्ट थे, तो आदेश जारी करने से पहले सभी प्रशासनिक तैयारियां क्यों नहीं की गईं? यदि किसी प्रकार की तकनीकी या प्रशासनिक त्रुटि थी, तो उसकी जिम्मेदारी किसकी है? और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह कि आखिर ऐसी कौन-सी परिस्थिति उत्पन्न हुई कि विभाग को महज एक दिन के भीतर अपने ही आदेश को स्थगित करना पड़ गया?
शाला प्रबंधन समिति विद्यालयों में अभिभावकों की भागीदारी सुनिश्चित करने, विद्यालय विकास योजनाओं की निगरानी, वित्तीय पारदर्शिता बनाए रखने तथा शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ऐसे में समिति गठन की प्रक्रिया पर अचानक रोक लगने से अभिभावकों के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि कहीं यह निर्णय पारदर्शिता और जनभागीदारी की प्रक्रिया को प्रभावित तो नहीं कर रहा।
शिक्षा जगत से जुड़े लोगों का कहना है कि यदि आदेश जारी करने के तुरंत बाद उसे वापस लेना पड़े, तो इससे विभाग की प्रशासनिक तैयारी और निर्णय प्रक्रिया पर सवाल उठना स्वाभाविक है। इससे न केवल अधिकारियों और शिक्षकों में भ्रम की स्थिति बनती है, बल्कि शासन के निर्देशों की गंभीरता पर भी प्रश्नचिह्न लगता है।
फिलहाल विभाग की ओर से यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि समिति गठन पर रोक लगाने के पीछे वास्तविक कारण क्या है और यह स्थगन कितने समय तक प्रभावी रहेगा। ऐसे में अभिभावकों, जनप्रतिनिधियों और शिक्षा से जुड़े लोगों की मांग है कि विभाग इस पूरे मामले में सार्वजनिक रूप से स्थिति स्पष्ट करे, स्थगन का कारण बताए और जल्द से जल्द शाला प्रबंधन समितियों के गठन की नई समय-सीमा जारी करे, ताकि विद्यालयों में जनभागीदारी और पारदर्शिता की प्रक्रिया प्रभावित न हो।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है
क्या शाला प्रबंधन समिति का गठन केवल सरकारी फाइलों तक सीमित रह जाएगा, या शिक्षा विभाग अपने ही आदेशों का समयबद्ध और पारदर्शी तरीके से पालन सुनिश्चित करेगा? इस सवाल का जवाब अब विभाग को ही देना होगा।

