खरसिया :- खाद्य पदार्थों में मिलावट पर रोक लगाने के उद्देश्य से खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग द्वारा खरसिया क्षेत्र में कई दुकानों का निरीक्षण कर खाद्य सामग्रियों के नमूने लिए गए। कार्रवाई के दौरान अलग-अलग दुकानों से मिठाई, बिस्कुट और अन्य खाद्य पदार्थों के सैंपल लेकर उन्हें सील पैक किया गया। अधिकारियों के अनुसार इन नमूनों को जांच के लिए विभागीय प्रयोगशाला भेजा जाएगा और रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।
जानकारी के अनुसार खाद्य सुरक्षा अधिकारी एवं औषधि प्रशासन रायगढ़ नेमिचंद पटेल तथा तकनीकी सहायक अमित साहू ने खरसिया के टाउन हॉल मैदान में स्थित दुकानों का निरीक्षण किया। इस दौरान यश अग्रवाल के गणेश जनरल स्टोर से मीठी बर्फी और सोनपापड़ी तथा अमर बेरीवाल के अमर ट्रेडर्स से नारियल चॉकलेट और सोनपापड़ी के नमूने लिए गए।
इसके अलावा खरसिया की अन्य दुकानों से भी खाद्य सामग्री के सैंपल लिए गए। मनोज अग्रवाल के वीर मार्ट से हल्दीराम के रसगुल्ले और मेयोनीज तथा राम मनोहर के राजू किराना स्टोर से अनमोल टॉप रॉयल बिस्कुट का नमूना लिया गया। सभी नमूनों को नियमानुसार सील पैक कर जांच के लिए ले जाया गया।
रायपुर की एक ही लैब पर निर्भरता, रिपोर्ट में लग सकता है लंबा समय
कार्रवाई के दौरान अधिकारियों के अनुसार पूरे छत्तीसगढ़ में खाद्य नमूनों की जांच के लिए विभाग की एक प्रमुख प्रयोगशाला रायपुर में स्थित है। ऐसे में अलग-अलग जिलों से भेजे जाने वाले नमूनों की जांच और रिपोर्ट आने में काफी समय लगता है। अधिकारियों ने बताया कि रिपोर्ट आने में लगभग एक महीने या उससे भी अधिक समय लगने की स्थिति बन जाती है।
यही व्यवस्था अब सवालों के घेरे में है। यदि किसी खाद्य पदार्थ का नमूना वास्तव में मिलावटी है, तो उसकी प्रयोगशाला रिपोर्ट आने तक संबंधित दुकान पर मौजूद उसी बैच या समान खाद्य सामग्री की बिक्री जारी रहने की आशंका बनी रहती है। ऐसे में सवाल उठता है कि जांच रिपोर्ट आने तक संभावित मिलावटी खाद्य पदार्थों की बिक्री को रोकने के लिए विभाग के पास क्या प्रभावी व्यवस्था है?
सैंपल लिया, लेकिन तत्काल पूरी सामग्री जब्त नहीं
अधिकारी के अनुसार छापे या निरीक्षण के दौरान सीधे तौर पर पूरा सामान जब्त करने के बजाय नियमानुसार खाद्य पदार्थ का नमूना लेकर उसे प्रयोगशाला जांच के लिए भेजा जाता है। यदि जांच रिपोर्ट में मिलावट या खाद्य मानकों का उल्लंघन पाया जाता है, तो संबंधित व्यक्ति के खिलाफ नियमानुसार जुर्माना एवं सजा का प्रावधान है।
हालांकि आम लोगों के बीच इस प्रक्रिया को लेकर असंतोष दिखाई दे रहा है। लोगों का कहना है कि केवल नमूना लेने और रिपोर्ट आने में लंबा समय लगने से कार्रवाई का तत्काल प्रभाव नजर नहीं आता। उनका सवाल है कि यदि किसी खाद्य पदार्थ में मिलावट की आशंका है तो रिपोर्ट आने तक बाजार में उसकी बिक्री जारी रहने की स्थिति में उपभोक्ताओं की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी?
“हमेशा छोटी दुकानों पर ही कार्रवाई क्यों?”
खाद्य विभाग की कार्रवाई के बाद स्थानीय स्तर पर एक और सवाल चर्चा में है—क्या खाद्य सुरक्षा की जांच का दायरा बड़े व्यापारियों और बड़े प्रतिष्ठानों तक भी समान रूप से पहुंच रहा है?
कुछ स्थानीय लोगों और व्यापारियों का कहना है कि कार्रवाई के दौरान अक्सर छोटी दुकानों और छोटे व्यापारियों को ही निशाना बनाया जाता है, जबकि बड़े कारोबारियों एवं बड़े प्रतिष्ठानों पर उतनी सख्ती दिखाई नहीं देती।
लोगों की मांग है कि खाद्य विभाग को छोटे-बड़े सभी व्यापारियों के खिलाफ समान और पारदर्शी तरीके से जांच अभियान चलाना चाहिए, ताकि किसी भी स्तर पर मिलावट करने वालों को संरक्षण मिलने की धारणा खत्म हो।
रिपोर्ट आने में देरी, तो उपभोक्ता की सुरक्षा कैसे?
खाद्य पदार्थों में मिलावट का मामला सीधे आम लोगों के स्वास्थ्य और सुरक्षा से जुड़ा है। मिठाई, दूध से बने उत्पाद, मसाले, बिस्कुट, सॉस, मेयोनीज और अन्य खाद्य पदार्थ रोजाना बड़ी संख्या में लोग इस्तेमाल करते हैं। यदि इनमें से कोई उत्पाद मानकों के विपरीत पाया जाता है, तो समय पर कार्रवाई बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि विभागीय जांच रिपोर्ट आने में कई सप्ताह लग जाते हैं, तो संभावित मिलावटी खाद्य पदार्थ की बिक्री को रोकने की तत्काल व्यवस्था क्या है? व्यापारी यदि जांच के दौरान वही या दूसरे स्टॉक की बिक्री करता रहता है, तो केवल बाद में रिपोर्ट आने और जुर्माना लगाने से उपभोक्ताओं को तत्काल सुरक्षा कैसे मिलेगी?
कार्रवाई के साथ व्यवस्था में सुधार की भी जरूरत
खाद्य विभाग द्वारा नमूने लेना निश्चित रूप से खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता जांचने की प्रक्रिया का हिस्सा है, लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि इसके साथ जांच व्यवस्था को भी तेज किया जाना चाहिए। जिले या संभाग,जिले स्तर पर पर्याप्त प्रयोगशाला सुविधाएं उपलब्ध हों, जांच रिपोर्ट समयबद्ध तरीके से मिले और संदिग्ध खाद्य सामग्री की बिक्री रोकने के लिए स्पष्ट एवं प्रभावी व्यवस्था हो, तो मिलावट के खिलाफ कार्रवाई का असर और मजबूत हो सकता है।

अब देखने वाली बात यह होगी कि खरसिया से लिए गए इन खाद्य पदार्थों के नमूनों की जांच रिपोर्ट कब आती है और उसमें क्या तथ्य सामने आते हैं। यदि किसी नमूने में मिलावट अथवा निर्धारित मानकों का उल्लंघन पाया जाता है, तो विभाग संबंधित व्यापारी के खिलाफ नियमानुसार क्या कार्रवाई करता है।

फिलहाल खाद्य विभाग की कार्रवाई के बाद एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा हो गया है—सिर्फ सैंपल लेने और रिपोर्ट आने का इंतजार करने से क्या मिलावट पर प्रभावी रोक लग पाएगी, या उपभोक्ताओं की सुरक्षा के लिए जांच और कार्रवाई की पूरी प्रक्रिया को और तेज करने की जरूरत है?

