सक्ती :- “न जमीन मिली, न न्याय, न सम्मान… अब शांति से मरने की इजाज़त दीजिए।”
ये शब्द हैं 70 वर्षीय बुज़ुर्ग महिला श्रीमती सुजिला बाई के, जो बीते नौ वर्षों से अपनी पुश्तैनी जमीन के लिए न्याय की गुहार लगा रही हैं, लेकिन उन्हें आज तक सिर्फ ठोस आश्वासन और सरकारी दफ्तरों की बेरुखी ही मिली।
ग्राम बड़े खेड़ (थाना सारागांव, तहसील डभरा) निवासी सुजिला बाई का दावा है कि उनके पति स्व. सुदन बाई के नाम ग्राम उमरगांव में 4.581 हेक्टेयर भूमि दर्ज थी, जिसमें से 0.980 हेक्टेयर यानी 324 बेंच उनकी वैधानिक पुश्तैनी जमीन है। पति के निधन के बाद उन्होंने वर्ष 2015 में नामांतरण हेतु आवेदन किया, जिस पर 31 मार्च 2015 को आदेश भी पारित कर दिया गया था।
“कागजों में नाम, पर जमीन पर नहीं हक”
इतिहास गवाह है कि भारत में जमीन के लिए जंग सबसे लम्बी होती है, और सुजिला बाई का मामला इसका जीवंत उदाहरण है। आदेश पारित हुए 9 साल बीत चुके, लेकिन न तो राजस्व अभिलेखों में नाम दर्ज हुआ, न ही उन्हें जमीन पर वास्तविक अधिकार मिल सका।
रोजनामचा, नामांतरण पंजी, और अधिकार अभिलेख में अब तक कोई सुधार नहीं किया गया, जो दर्शाता है कि सिस्टम की फाइलों में इंसाफ किस कदर दबकर रह गया है।
“फाइलों में दबा इंसाफ, सिस्टम की नाकामी की गूंज”
सुजिला बाई ने थाना सारागांव, तहसील डभरा, और कलेक्टर कार्यालय तक कई बार आवेदन दिए, लेकिन उन्हें हर बार सिर्फ एक जवाब मिला – “जांच चल रही है”, “फाइल लंबित है”।
सत्र 2018-19 में SDM कार्यालय द्वारा याचिका स्वीकार की गई थी, लेकिन नतीजा आज तक शून्य है।
“जीने की बजाय अब मरने की चाहत”
थक-हार कर, 21 जुलाई 2025 को उन्होंने जिला कलेक्टर, सक्ती को आवेदन भेजकर इच्छा मृत्यु की अनुमति मांगी है। उन्होंने लिखा:
> “यदि मुझे मेरी जमीन पर अधिकार नहीं दिया जा सकता, तो कृपया मुझे शांति से मरने की अनुमति दी जाए।”
“यह सिर्फ एक महिला की लड़ाई नहीं, लोकतंत्र की असफलता का प्रमाण है”
यह मामला सिर्फ एक महिला की जमीन का नहीं, बल्कि यह प्रशासनिक असंवेदनशीलता, कानूनी प्रक्रिया की धीमी चाल और सिस्टम की विफलता की गवाही है। जब एक बुज़ुर्ग महिला, जिसके पास सभी वैध कागजात हैं, फिर भी न्याय से वंचित रहती है — तो क्या लोकतंत्र की आत्मा जीवित मानी जा सकती है?
अब सवाल जनता का है – कब मिलेगा न्याय?
अब जब मामला फिर से उजागर हुआ है, क्या प्रशासन जागेगा?
क्या कलेक्टर सक्ती इस बार कोई ठोस कदम उठाएंगे?
या फिर एक और बुज़ुर्ग महिला सिस्टम की चुप्पी में दम तोड़ देगी?

