खरसिया :- सरकार बच्चों को बेहतर शिक्षा देने और सरकारी स्कूलों में शैक्षणिक व्यवस्था मजबूत करने के लगातार दावे कर रही है। लेकिन खरसिया विकासखंड के मदनपुर अंग्रेजी माध्यम स्कूल से सामने आई स्थिति इन दावों की जमीनी हकीकत पर सवाल खड़े कर रही है। शैक्षणिक सत्र शुरू हुए करीब तीन महीने बीत जाने के बावजूद कक्षा पहली से आठवीं तक के विद्यार्थियों को अब तक पाठ्यपुस्तकें नहीं मिलने की बात सामने आई है।
स्कूल में नियमित रूप से कक्षाएं संचालित हो रही हैं और बच्चे पढ़ाई के लिए स्कूल पहुंच रहे हैं, लेकिन उनके हाथों में जरूरी पाठ्यपुस्तकें नहीं हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि बिना किताबों के बच्चे अपनी पढ़ाई किस तरह प्रभावी ढंग से कर रहे हैं और उनकी शैक्षणिक तैयारी कैसे पूरी होगी?
स्कूल खुल गया, लेकिन किताबें अब तक नहीं पहुंचीं
बताया जा रहा है कि स्कूल स्तर पर जब पाठ्यपुस्तकों के वितरण के संबंध में जानकारी ली गई तो जवाब मिला कि ऊपर से ही अब तक किताबें उपलब्ध नहीं कराई गई हैं। यदि यह स्थिति सही है, तो मामला केवल एक स्कूल तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि पाठ्यपुस्तकों की आपूर्ति, वितरण और निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करता है।
शैक्षणिक सत्र का शुरुआती समय विद्यार्थियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी दौरान पाठ्यक्रम की बुनियाद तैयार की जाती है। ऐसे में कई सप्ताह तक पाठ्यपुस्तकों का उपलब्ध नहीं होना विद्यार्थियों की पढ़ाई की गति और समझ दोनों को प्रभावित कर सकता है।
बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होने की आशंका
पाठ्यपुस्तकें विद्यार्थियों की पढ़ाई का सबसे बुनियादी साधन हैं। शिक्षक कक्षा में अध्यापन तो कर सकते हैं, लेकिन यदि विद्यार्थियों के पास स्वयं अध्ययन और अभ्यास के लिए किताबें उपलब्ध न हों, तो उनकी पढ़ाई प्रभावित होना स्वाभाविक है।
खासकर प्राथमिक और माध्यमिक कक्षाओं के विद्यार्थियों के लिए किताबों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। ऐसे में तीन महीने तक किताबों का इंतजार विद्यार्थियों और अभिभावकों दोनों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है।
जिम्मेदारी किसकी, जवाब कौन देगा?
इस पूरे मामले में अब सबसे बड़ा सवाल शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर है। यदि स्कूल खुलने के बाद भी विद्यार्थियों को समय पर किताबें नहीं मिलीं, तो पाठ्यपुस्तकों की मांग, आपूर्ति, परिवहन और वितरण की प्रक्रिया में देरी कहां हुई?
अभिभावक यह भी जानना चाहते हैं कि स्कूल खुलने से पहले किताबों की उपलब्धता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी किस अधिकारी या स्तर की थी। खंड शिक्षा कार्यालय से लेकर जिला स्तर तक इस व्यवस्था की निगरानी कैसे की गई, यह भी जांच का विषय है।
अभिभावकों का सवाल—किताबें आखिर कब मिलेंगी?
अभिभावकों के सामने अब सीधा सवाल है कि जब शैक्षणिक सत्र के करीब तीन महीने गुजर चुके हैं, तो विद्यार्थियों को पाठ्यपुस्तकें आखिर कब उपलब्ध होंगी? कहीं ऐसा न हो कि बच्चे किताबों का इंतजार करते-करते परीक्षा के करीब पहुंच जाएं।
अभिभावकों का कहना है कि सरकार और शिक्षा विभाग यदि सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए गंभीर हैं, तो किताब, शिक्षक और अन्य बुनियादी शैक्षणिक संसाधनों की समय पर उपलब्धता सुनिश्चित करना सबसे पहली प्राथमिकता होनी चाहिए।
नारे से आगे, जमीन पर दिखना चाहिए बदलाव
‘पढ़ेगा इंडिया, बढ़ेगा इंडिया’ जैसे अभियान तभी सार्थक होंगे, जब बच्चों को पढ़ने के लिए जरूरी संसाधन समय पर उपलब्ध हों। मदनपुर अंग्रेजी माध्यम स्कूल के विद्यार्थियों को तीन महीने बाद भी किताबों का इंतजार करना पड़ रहा है, तो यह निश्चित रूप से व्यवस्था की समीक्षा की मांग करता है।
अब देखना होगा कि शिक्षा विभाग इस मामले को कितनी गंभीरता से लेता है और विद्यार्थियों को पाठ्यपुस्तकें उपलब्ध कराने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं। साथ ही यह भी स्पष्ट होना जरूरी है कि किताबों की आपूर्ति में देरी किस स्तर पर हुई और इसके लिए जिम्मेदारी किसकी तय की जाएगी।

