जांजगीर चांपा :- गांवों की पत्रकारिता, जो कभी जनता की आवाज मानी जाती थी, आज कुछ तथाकथित “झोलाछाप पत्रकारों” की वजह से बदनाम हो रही है। सवाल यह है कि आखिर कब तक माइक और कैमरे के नाम पर गांवों में ब्लैकमेलिंग का यह खेल चलता रहेगा?
सरपंच–सचिव निशाने पर
ग्रामीण इलाकों से लगातार शिकायतें मिल रही हैं कि कुछ लोग खुद को पत्रकार बताकर सरपंचों और पंचायत सचिवों पर दबाव बना रहे हैं। आरोप है कि वे छोटी–मोटी प्रशासनिक खामियों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने की धमकी देते हैं और बदले में मोटी रकम की मांग करते हैं। यह सीधा-सीधा वसूली का धंधा है, जिसे पत्रकारिता का नाम देकर अंजाम दिया जा रहा है।
RTI का हथियार, खबर का सौदा
सूचना के अधिकार जैसे संवैधानिक औजार का इस्तेमाल पारदर्शिता के लिए होना चाहिए, लेकिन कुछ तथाकथित पत्रकार इसे डर दिखाने का हथियार बना रहे हैं। पहले सूचना मांगो, फिर धमकी दो, और फिर समझौते के नाम पर रकम ऐंठो—यह प्रवृत्ति न सिर्फ गैरकानूनी है बल्कि लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करने वाली है।
पत्रकारिता नहीं, पेशे का अपमान
पत्रकारिता 5W1H के सिद्धांतों, तथ्य, संतुलन और जवाबदेही पर टिकी होती है। लेकिन जब बिना प्रशिक्षण और बिना नैतिकता के लोग इस पेशे का चोला पहन लेते हैं, तो असली पत्रकारों की साख भी दांव पर लग जाती है। कुछ लोगों की हरकतों से पूरे मीडिया जगत को कटघरे में खड़ा किया जा रहा है।
जवाबदेही तय करने का समय
अब वक्त आ गया है कि फर्जी पहचान पत्रों पर सख्त कार्रवाई हो, मीडिया संस्थानों की जवाबदेही तय हो और पत्रकारिता को पेशेवर मानकों से जोड़ा जाए। प्रशासन और मीडिया संगठनों को मिलकर ऐसे तत्वों पर लगाम लगानी होगी, वरना खबर और अफवाह के बीच की रेखा मिटते देर नहीं लगेगी।
स्पष्ट है—यदि अभी भी कार्रवाई नहीं हुई तो गांवों में पत्रकारिता की विश्वसनीयता पूरी तरह खत्म हो सकती है। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कमजोर हुआ तो इसकी कीमत पूरे समाज को चुकानी पड़ेगी।

