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माँ की कृपा से मिलती है संतों और परमात्मा की कृपा : आचार्य मृदुल कृष्ण गोस्वामी

Admin
Admin September 16, 2026 CHHATTISGARH Kharsiya
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7 Min Read

खरसिया :- अजित सिंह नगर खरसिया में बहु झोलरीवाले गर्ग परिवार के तत्वावधान में आयोजित श्रीमदभागवत कथा के चतुर्थ दिवस श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक भावनाओं से वातावरण भक्तिमय हो उठा। कथा व्यास आचार्य मृदुल कृष्ण गोस्वामी जी महाराज ने श्रीमदभागवत के विभिन्न प्रसंगों का भावपूर्ण वर्णन करते हुए श्रद्धालुओं को मां की सेवा, निष्काम भक्ति, सत्संग तथा सदाचारी जीवन का महत्व समझाया।

मां की सेवा से मिलती है संतों और परमात्मा की कृपा

आचार्य ने कहा कि श्रीमदभागवत में पुत्र के लिए मां का स्थान सर्वोच्च बताया गया है। जिस व्यक्ति पर मां की कृपा होती है, उस पर संत-महात्माओं की कृपा होती है और संतों की कृपा प्राप्त होने पर परमात्मा की कृपा का मार्ग प्रशस्त होता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपनी मां की सदैव सेवा करनी चाहिए और उनका आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए।

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उन्होंने कहा कि जिस घर में मां सुखी रहती हैं, वह घर स्वर्ग के समान बन जाता है। मां की प्रसन्नता और आशीर्वाद परिवार के लिए सबसे बड़ी संपत्ति है।

निष्काम भक्ति ही सर्वश्रेष्ठ

भक्ति के स्वरूप को समझाते हुए आचार्य ने कहा कि भजन के चार प्रकार बताए गए हैं। पहला भजन व्यक्ति किसी आशा अथवा लोभ के कारण करता है। दूसरा भय के कारण प्रभु की शरण में जाता है। तीसरा व्यक्ति अपने कर्तव्य के रूप में भजन करता है, जबकि चौथे प्रकार के भक्त केवल प्रेम के कारण ईश्वर का भजन करते हैं।

उन्होंने कहा कि लोभ अथवा किसी कामना की पूर्ति के लिए की जाने वाली भक्ति अधिक समय तक स्थिर नहीं रहती। एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी इच्छा जन्म ले लेती है। मनुष्य की कामनाएं अनंत हैं। जब कोई इच्छा पूरी नहीं होती तो कई बार मन में ईश्वर के प्रति अविश्वास भी उत्पन्न होने लगता है। इसलिए निष्काम भाव से की गई भक्ति को श्रेष्ठ माना गया है।

गीता में बताए गए चार प्रकार के भक्त

आचार्य मृदुल कृष्ण गोस्वामी जी महाराज ने श्रीमदभागवद्गीता का उल्लेख करते हुए कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने चार प्रकार के भक्तों का वर्णन किया है—ज्ञानी, आर्त, जिज्ञासु और अर्थार्थी। अर्थार्थी भक्त धन अथवा किसी विशेष कामना की पूर्ति के लिए भगवान का स्मरण करता है। वहीं निष्काम भाव से प्रभु की आराधना करने वाला भक्त किसी स्वार्थ की अपेक्षा नहीं रखता।

उन्होंने कहा कि निष्काम भक्ति में भक्त और भगवान के बीच प्रेम का संबंध स्थापित होता है और ऐसे भक्त पर प्रभु की विशेष कृपा होती है।

राजा का चरित्र श्रेष्ठ और प्रजाहितकारी होना चाहिए

कथा के दौरान आचार्य श्री ने राजा के चरित्र का भी विस्तार से वर्णन किया। उन्होंने कहा कि किसी राजा का चरित्र श्रेष्ठ, समभाव वाला और सदाचारी होना चाहिए। राजा का आचरण केवल उसके व्यक्तिगत जीवन को प्रभावित नहीं करता, बल्कि उसका प्रभाव पूरी प्रजा पर पड़ता है।

उन्होंने कहा कि जिस राज्य का शासक पाप और दुराचार के मार्ग पर चलता है, वहां प्रजा को अनेक प्रकार के कष्टों का सामना करना पड़ता है। ऐसे राज्य में अकाल और विभिन्न प्रकार के प्रकोप बने रहते हैं तथा प्रजा सदैव दुःखी रहती है। इसलिए शासक के लिए सदाचार, न्याय, समभाव और प्रजाहित की भावना अत्यंत आवश्यक है।

सत्संग से दूर होती है अज्ञानता

सत्संग की महिमा बताते हुए आचार्य ने श्रद्धालुओं से नियमित रूप से सत्संग करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को अपने व्यस्त जीवन में से समय निकालकर सत्संग अवश्य करना चाहिए। सत्संग के माध्यम से मनुष्य अनीति और पाप कर्मों से दूर रहता है तथा उसके भीतर विवेक और सद्बुद्धि का विकास होता है।

उन्होंने कहा कि सत्संग से बुद्धि की जड़ता और अज्ञानता दूर होती है तथा भगवान के प्रति प्रेम बढ़ता है। प्रत्येक परिवार को श्रीमदभागवत, रामायण और श्रीमदभागवद्गीता जैसे पवित्र ग्रंथों का पाठ और श्रवण करना चाहिए। जिस घर में इन पवित्र ग्रंथों का नियमित पाठ, श्रवण और सम्मान होता है, वहां आध्यात्मिक वातावरण निर्मित होता है।

अनेक दिव्य प्रसंगों का हुआ भावपूर्ण वर्णन

कथा के चतुर्थ दिवस आचार्य ने अपने श्रीमुख से अनेक महत्वपूर्ण एवं दिव्य प्रसंगों का विस्तारपूर्वक वर्णन किया। इनमें मनु और प्रियव्रत की कथा, भगवान के चौबीस अवतारों की कथा, जड़ भरत की कथा, ऋषभदेव जी महाराज की कथा, विभिन्न नरकों का वर्णन, वामनावतार तथा भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की कथा प्रमुख रही।

प्रसंगों के माध्यम से आचार्य ने श्रद्धालुओं को धर्म, कर्म, भक्ति और जीवन के आध्यात्मिक मूल्यों का संदेश दिया।

श्रीकृष्ण जन्मोत्सव की झांकियों ने मोहा मन

भगवान श्रीकृष्ण के जन्म प्रसंग के दौरान कथा स्थल का वातावरण विशेष रूप से भक्तिमय हो गया। श्रीकृष्ण जन्मोत्सव की मनमोहक झांकियों ने श्रद्धालुओं का मन मोह लिया। बाल स्वरूप श्रीकृष्ण की सुंदर झांकी के दर्शन कर श्रद्धालु भावविभोर नजर आए।

इस दौरान कथा पंडाल में भक्ति गीतों और जयकारों से वातावरण गूंज उठा। “आओ आओ मेरे नंदलाल आ जाओ”, “तेरे संग में रहेंगे ओ मोहना” और “तेरे चरण कमल में श्याम, लिपट जाऊं रज बन के” जैसे भावपूर्ण एवं सुमधुर भजनों ने श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। भक्तजन भजनों की धुन पर झूमते और भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में भावविभोर होते दिखाई दिए।

कथा के दौरान पूरा वातावरण “नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की” के जयघोष से भक्तिमय हो उठा। श्रद्धालुओं ने भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का आनंद लेते हुए भक्ति और उत्साह के साथ कथा का श्रवण किया।

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Admin September 16, 2026
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