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धर्म, योग, यज्ञ और तप का एकमात्र लक्ष्य प्रभु प्रेम में मन को लगाना : द्वितीय दिवस की कथा में गूंजा भक्ति और सत्य का संदेश

Admin
Admin September 14, 2026 CHHATTISGARH Kharsiya
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7 Min Read

खरसिया :- श्रीमदभागवत् सप्ताह कथा के द्वितीय दिवस कथा व्यास परम श्रद्धेय आचार्य गोस्वामी मृदुल कृष्ण महाराज ने श्रीमदभागवत् के महात्म्य और उसके जीवन पर पड़ने वाले आध्यात्मिक प्रभाव का विस्तार से वर्णन किया। उन्होंने कहा कि श्रीमदभागवत् कथा का श्रद्धापूर्वक श्रवण मात्र करने से व्यक्ति के भीतर भगवान के प्रति ऐसी भावनाएं जागृत होती हैं कि उसकी तन्यमता प्रभु में होने लगती है। मन, वाणी और कर्म से व्यक्ति भगवान के चिंतन एवं भक्ति में लीन होने लगता है।

आचार्य ने कहा कि धर्म जगत में किए जाने वाले सभी योग, यज्ञ, तप, अनुष्ठान और साधनाओं का मूल उद्देश्य एक ही है कि हमारी भक्ति भगवान में निरंतर लगी रहे। साधक की यही कामना होनी चाहिए कि वह अहर्निश, प्रतिक्षण प्रभु प्रेम में समाया रहे। जीवन की सार्थकता इसी में है कि संसार के प्रत्येक कण में भक्त को अपने प्रभु का दर्शन होने लगे।

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उन्होंने कहा कि श्रीमदभागवत् कथा के श्रवण से भक्त के हृदय में ऐसी आध्यात्मिक भावनाएं समाहित होती हैं, जो धीरे-धीरे उसके जीवन और व्यवहार में दिखाई देने लगती हैं। जब मनुष्य का मन भगवान में रम जाता है तो उसकी वाणी में मधुरता, कर्मों में पवित्रता और जीवन में भक्ति का भाव स्वतः प्रकट होने लगता है।

‘सत्यं परं धीमहि’ से होता है भागवत् का मंगलाचरण

आचार्य गोस्वामी मृदुल कृष्ण महाराज ने श्रीमदभागवत् के प्रारंभ में किए गए सत्य के वंदन की व्याख्या करते हुए कहा कि सत्य व्यापक है, सत्य सर्वत्र विद्यमान है और प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में सत्य की चाह होती है।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि पिता अपने पुत्र से सत्य बोलने की अपेक्षा रखता है, भाई अपने भाई से सत्य के मार्ग पर चलने की चेष्टा करता है और मित्र अपने मित्र से सत्यता निभाने की कामना करता है। यहां तक कि चोरी करने वाले चोर भी आपस में सत्यता की अपेक्षा रखते हैं। इससे स्पष्ट है कि सत्य मनुष्य के जीवन का मूल आधार है।

आचार्य ने कहा कि इसी कारण श्री वेदव्यास जी ने श्रीमदभागवत् के प्रारंभ में सत्य की वंदना करते हुए मंगलाचरण किया है। भागवत् का प्रारंभ भी सत्य की वंदना से होता है और उसका मूल संदेश भी सत्य में ही प्रतिष्ठित है—‘सत्यं परं धीमहि।’

उन्होंने कहा कि सत्य ही भगवान श्रीकृष्ण हैं, सत्य ही प्रभु श्रीराम हैं, सत्य ही भगवान शिव हैं और सत्य ही मां दुर्गा का स्वरूप है। जो व्यक्ति कथा के माध्यम से सत्य को स्वीकार करता है, वह धीरे-धीरे सत्य में रमने लगता है और सत्य स्वरूप परमात्मा के प्रति उसकी तन्यमता बढ़ती जाती है।

निष्कपट धर्म ही श्रीमदभागवत् का मूल संदेश

कथा के दौरान आचार्य ने श्रीमदभागवत् में वर्णित निष्कपट धर्म की भी विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि श्रीमदभागवत् निष्कपट धर्म का वर्णन करता है। जिस व्यक्ति के हृदय में कपट और ईर्ष्या का भाव नहीं है, जो निर्मत्सर है, वही व्यक्ति वास्तविक अर्थों में कथा कहने और कथा श्रवण करने का अधिकारी है।

उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि कथा श्रवण केवल एक धार्मिक आयोजन के रूप में न करें, बल्कि इसके संदेश को अपने जीवन में उतारने का प्रयास करें। कथा का वास्तविक फल तभी प्राप्त होता है, जब भगवान की कथा सुनने के साथ-साथ मनुष्य अपने भीतर के विकारों को दूर करने और जीवन को सत्य, प्रेम, करुणा एवं भक्ति से भरने का प्रयास करे।

आचार्य ने कहा कि श्रीमदभागवत् कथा श्रवण का संकल्प लेना भी अपने आप में अत्यंत मंगलकारी है। भगवान की कथा के प्रति श्रद्धा जागृत होते ही भक्त के हृदय में श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम और विश्वास का संचार होने लगता है। उन्होंने भक्तों को विश्वास दिलाया कि सच्चे भाव से भगवान की शरण में जाने वाले भक्त के हृदय में भगवान स्वयं विराजमान हो जाते हैं।

वेदरूपी वृक्ष का पका हुआ फल है श्रीमदभागवत्

कथा क्रम में आचार्य ने श्रीमदभागवत् की महिमा बताते हुए इसे वेदरूपी वृक्ष का पका हुआ फल बताया। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार वृक्ष का पका हुआ फल अपने भीतर मधुरता और रस को समेटे रहता है, उसी प्रकार श्रीमद्भागवत् वेदरूपी वृक्ष का पका हुआ एवं सारभूत फल है।

उन्होंने कहा कि सामान्य फलों में गुठली और छिलका होता है, लेकिन भागवत् रूपी फल में गुठली और छिलके का कोई स्थान नहीं है, यह केवल दिव्य रस से परिपूर्ण है। इसीलिए श्रीमदभागवत् का रस जितना अधिक श्रवण किया जाए, उतना ही अधिक हृदय निर्मल और जीवन आनंदमय होता जाता है।

आचार्य ने श्रद्धालुओं से कहा कि श्रीमदभागवत् के इस अमृतमय रस का पान केवल सप्ताह कथा तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि व्यक्ति को जीवन पर्यंत भगवान की कथा, नाम और भक्ति का रस ग्रहण करते रहना चाहिए।

इष्ट के प्रति प्रगाढ़ भक्ति ही जीवन का परम धर्म

अपने उद्बोधन के अंत में आचार्य गोस्वामी मृदुल कृष्ण महाराज ने कहा कि मनुष्य के जीवन का सर्वश्रेष्ठ और परम धर्म यही है कि उसके हृदय में अपने इष्ट के प्रति प्रगाढ़ भक्ति उत्पन्न हो जाए। जब भक्त का मन प्रभु के चरणों में लग जाता है तो संसार के विषय उसे पहले की तरह आकर्षित नहीं करते और जीवन का प्रत्येक कर्म प्रभु को समर्पित होने लगता है।

उन्होंने कहा कि श्रीमदभागवत् केवल सुनने की कथा नहीं, बल्कि जीवन को बदलने वाला आध्यात्मिक मार्ग है। इसके श्रवण से मनुष्य सत्य के निकट जाता है, निष्कपटता को अपनाता है, ईर्ष्या और अहंकार का त्याग करता है तथा अपने हृदय में भगवान के प्रति प्रेम और भक्ति को विकसित करता है।

द्वितीय दिवस की कथा के दौरान श्रद्धालु भक्तिभाव में डूबे रहे और कथा पंडाल में भगवान के नाम एवं भक्ति का वातावरण बना रहा। आचार्य के श्रीमुख से निकले भागवत् संदेश ने उपस्थित श्रद्धालुओं को सत्य, भक्ति और प्रभु प्रेम के मार्ग पर चलने का संदेश दिया।

भव्या छत्तीसगढ़ ईपेपर

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Admin September 14, 2026
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