खरसिया :- क्या अब इंसान की जान की कीमत सिर्फ दो लाख रुपये और एक नोटरी की मुहर तय करेगी? खरसिया टाउनहाल मैदान में सजे मीना बाज़ार ने यह साबित कर दिया है कि इस देश में गरीबों की सांसों की मियाद कागज़ के चंद टुकड़ों और कुछ नोटों की गड्डियों से तौली जाती है।
बीते 20 अक्टूबर 2026 को दशहरा मेले के आनंद के बीच, पुसौर निवासी हालमुकाम पठानपारा, खरसीया नकुल निषाद अपने बच्चों को झूला झुलाने गए थे। झूले का झूला क्या हिला, एक हंसता-खेलता इंसान हमेशा के लिए बुझ गया। हादसे के बाद जिस संचालक दीपक मौर्य की गर्दन पुलिस के शिकंजे में होनी चाहिए थी, उसने बड़ी चतुराई से मौत का सौदा कर लिया।
अरे वाह रे “न्यायपालिका” दो लाख में बिक गया इंसान और बिक गया कानून!
घटना के अगले ही दिन यानी 21 अक्टूबर को नोटरी के सामने जो शर्मनाक तमाशा हुआ, उसने न्याय के चीरहरण की सारी हदें पार कर दीं। नोटरी के स्टांप पेपर पर लिखी इबारत खुद गवाह है कि कैसे एक गरीब की मजबूरी का मज़ाक उड़ाया गया “मेरे पति की मौत पर मीना बाजार के संचालक दीपक मौर्य द्वारा क्रियाकर्म हेतु 2 लाख की मुआवजा राशि प्रदान की गई, जिससे मैं पूरी तरह संतुष्ट हूँ… भविष्य में कोई शिकायत नहीं करूंगी।”
वाह रे व्यवस्था! यानी मेला संचालक लोगों की जान के साथ रूसी रूलेट खेलें, सुरक्षा के नाम पर कबाड़ झूले चलाएं और किसी की अर्थी उठने पर दो लाख फेंककर “क्लीन चिट” का सर्टिफिकेट जेब में डालकर घूम-घूमकर फिर मेले सजाएं! क्या मृतक नकुल निषाद के बच्चों के सिर से पिता का साया उठने की कीमत सिर्फ 2 लाख आंकी गई है?
पुलिस-प्रशासन की आंखें बंद या तिजोरी खुली?
कानून के पन्नों को उठाकर देख लीजिए, जनाब!
क्या बीएनएस की धारा 106(1) (लापरवाही से मौत) कोई आपसी समझौते की दुकान है, जिसे दो लाख रुपये देकर सेटल किया जा सके?
*गैर-शमनीय अपराध अब थानों या वकीलों के चैंबरों में बिकने लगे हैं?*
जमीनी हकीकत यह है कि मेला संचालकों की रसूख और प्रशासनिक लीपापोती के आगे कानून खुद घुटनों पर बैठा नजर आ रहा है। गवाहों की फौज खड़ी करके यह हलफनामा ले लिया गया कि “अब कोई शिकायत नहीं होगी” जैसे मौत कोई हादसा नहीं, बल्कि कोई आपसी टिफ़िन का लेन-देन हो।
*सवालों के कटघरे में सिस्टम*
क्या जिला प्रशासन और स्थानीय पुलिस को इस अवैध नोटरी सौदेबाजी की भनक तक नहीं है? या फिर खाकी और खादी की मिलीभगत से इस “मौत के सौदे” को मौन स्वीकृति मिल चुकी है?
क्या बिना फिटनेस और सुरक्षा मानकों के चल रहे इन “मौत के झूलों” पर अब कोई कार्रवाई होगी, या फिर हर मौत के बाद ऐसे ही नोटरी वाले स्टांप से जनता के मुंह पर पैसे का टेप चिपका दिया जाएगा?
अगर इस तरह के कागजी सौदों और नोटरी वाले समझौतों को खुली छूट मिलती रही, तो कल को हर मुनाफाखोर डीलर इंसानी जिंदगियों से खिलवाड़ करता रहेगा और जेब ढीली करके बच निकलेगा। अब देखना यह है कि क्या सोई हुई पुलिस इस “आपसी समझौते” के फंदे को चीरकर संचालक पर बीएनएस एक एक की धाराओं में शिकंजा कसती है, या फिर खरसिया में इंसानियत की कीमत हमेशा के लिए दो लाख रुपये ही दर्ज रह जाएगी!
मर चुकी है इंसानियत और मानवता एक तरफ एक व्यक्ति की लाश पड़ी और झूले रफ्तार से चलते रहे
यहां बताना लाजमी होगा कि मानवता और इंसानियत किस तरह मर चुकी है? एक तरफ एक मासूम गरीब की लाश पड़ी थी और दूसरी तरफ झूले अपनी उसी पूरी रौनक और रफ्तार से चल रहे थे। और आज दूसरे दिन भी दोगुनी रौनक से चल रहे हैं। पास क्या संचालक इतना दबंग और निर्भय है? कि उसे पता है कि कानून उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता यह बात इससे भी साबित हो रही थी कि प्रशासन की बिना परमिशन कि ही उसने मीना बाजार प्रारंभ कर दिया था।
वर्जन
इस संबंध में चौकी प्रभारी त्रिनात्र त्रिपाठी से बात करने पर उन्होंने कहा कि अभी मर्ग में जांच चल रही है और एफआईआर दर्ज नहीं की गई है।
*चौकी प्रभारी त्रिनाथ त्रिपाठी*
यहां सोचने वाली बात यह भी है कि 24 घंटे बीत जाने के बाद भी एफआईआर दर्ज नहीं की गई है और मीना बाज़ार संचालक द्वारा मृतक की पत्नी को दो लाख रुपए देकर समझौता भी कर लिया गया है। यह समझ से बाहर की बात है कि एक व्यक्ति की जान जाती है और उसकी जान की कीमत लगाते हुए स्टांप पेपर में तीन गवाहों के समक्ष समझौता कर लिया जाता है। यह कानून की कौन सी धारा में आता है? यह एक बहुत बड़ा सोचनीय विषय है।

