बच्चों की खुशी पर महंगाई की मार, मेला घूमना भी बना महंगा सौदा! गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए मनोरंजन पर संकट, प्रशासन की निगरानी पर उठे सवाल।
खरसिया :- शहर में लगे मीना बाजार में झूलों की कथित तौर पर ₹80 प्रति सवारी दर को लेकर आम जनता की जेब पर पड़ने वाले बोझ का सवाल उठने लगा है। जिस मीना बाजार को लोग अपने परिवार और बच्चों के साथ खुशियों के कुछ पल बिताने के लिए आते हैं, वहीं अब झूलों के दाम कई परिवारों के लिए परेशानी का कारण बन सकते हैं। सवाल यह है कि क्या महंगाई की मार झेल रहा आम आदमी अब अपने बच्चों को मेले में झूला झुलाने से पहले भी जेब का हिसाब लगाने को मजबूर होगा?
₹80 का एक झूला, पूरे परिवार का बजट बिगाड़ने का डर!
मीना बाजार में घूमने आने वाले परिवारों के लिए झूले बच्चों के आकर्षण का सबसे बड़ा केंद्र होते हैं। बच्चे एक झूला देखकर दूसरे झूले की जिद करते हैं, लेकिन जब एक सवारी के लिए ₹80 खर्च करने पड़ें, तो अभिभावकों के सामने बजट का सवाल खड़ा हो जाता है।
यदि परिवार में दो या तीन बच्चे हों और प्रत्येक बच्चा कई झूलों पर बैठना चाहे, तो खर्च तेजी से बढ़ सकता है। ऐसे में रोजमर्रा की जरूरतों, महंगे राशन, शिक्षा और अन्य घरेलू खर्चों के बीच गुजारा करने वाले परिवारों के लिए मेले का मनोरंजन भी महंगा साबित हो सकता है।
आखिर बच्चों की छोटी-सी खुशी के लिए भी आम माता-पिता को अपनी जेब इतनी ढीली क्यों करनी पड़े?
प्रशासन की निगरानी कहां है? जनता को चाहिए जवाब!
मीना बाजार में झूलों की दरें किस आधार पर निर्धारित की गई हैं? क्या आयोजकों द्वारा निर्धारित कीमतों की कोई जांच होती है? क्या झूलों की दरों की सूची सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित की गई है? और क्या प्रशासन यह सुनिश्चित करता है कि आम जनता से उचित दर ही ली जाए?
ये ऐसे सवाल हैं, जिन पर संबंधित प्रशासन और मेला आयोजकों को स्पष्ट जवाब देना चाहिए।
यदि दरें आयोजकों द्वारा तय की जाती हैं, तो उनकी पारदर्शिता और उचित होने को लेकर भी सवाल उठना स्वाभाविक है। आम जनता को यह जानने का अधिकार है कि एक झूले की सवारी के लिए निर्धारित कीमत क्या है और शिकायत होने पर वह किस अधिकारी से संपर्क कर सकती है।
मनोरंजन अमीरों तक सीमित न रहे, गरीबों के बच्चों का भी है अधिकार!
मेला केवल व्यापार का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक मेल-मिलाप, पारिवारिक मनोरंजन और बच्चों की खुशियों से जुड़ा आयोजन भी है। इसकी रौनक तभी सार्थक है, जब समाज के हर वर्ग के लोग इसमें शामिल हो सकें।
अगर झूलों की दरें आम परिवारों की पहुंच से बाहर होने लगें, तो मेले का आनंद भी आर्थिक हैसियत के आधार पर बंटने का खतरा पैदा हो जाता है। आखिर आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को भी वही खुशियां पाने का हक है, जो संपन्न परिवारों के बच्चों को मिलती हैं।
क्या मेले में मनोरंजन करना अब केवल उन्हीं परिवारों के लिए रह जाएगा, जिनकी जेब इसकी इजाजत देती है?
प्रशासन से प्रमुख मांगें
दरें तय करने में पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए और अनुचित कीमतों की शिकायतों पर कार्रवाई हो।
यदि नियमों के उल्लंघन या अनियमित वसूली की पुष्टि होती है, तो नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
आयोजकों और संबंधित अधिकारियों के बीच समन्वय से ऐसी उचित दरें सुनिश्चित की जाएं, ताकि आम परिवार भी बिना अत्यधिक आर्थिक बोझ के मेले का आनंद उठा सकें।
अब सवाल खरसिया प्रशासन से!
क्या संबंधित अधिकारी मीना बाजार में झूलों की दरों की जांच करेंगे? क्या आम जनता की शिकायतों को गंभीरता से लिया जाएगा? और क्या गरीब एवं मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चों को भी किफायती मनोरंजन उपलब्ध कराने की दिशा में कोई कदम उठाया जाएगा?
जनता को आश्वासन नहीं, स्पष्ट जवाब और उचित व्यवस्था चाहिए। मेले की रौनक तभी बढ़ेगी, जब वहां आने वाले परिवार खुश होकर लौटें, न कि खर्च के बोझ से परेशान होकर।
मनोरंजन सबका अधिकार है, किसी एक वर्ग की सुविधा नहीं!
खरसिया मीना बाजार में झूलों की ₹80 प्रति सवारी दर को लेकर उठे सवालों पर अब संबंधित प्रशासन और आयोजकों का पक्ष सामने आना चाहिए।

