कहीं ताला, कहीं पानी नहीं, कहीं सफाई का अता-पता नहीं; स्वच्छ भारत मिशन के नाम पर निर्माण के बाद जिम्मेदारी से मुंह मोड़ने का आरोप
खरसिया :- स्वच्छ भारत मिशन के नाम पर गांव-गांव स्वच्छता की तस्वीर बदलने के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन रायगढ़ जिले के खरसिया तहसील के कई गांवों में इन दावों की जमीनी हकीकत सवाल खड़े कर रही है। ग्राम पंचायतों में लाखों रुपये खर्च कर बनाए गए सामुदायिक शौचालयों में से कई के बंद पड़े होने, ताले में कैद रहने अथवा पानी और नियमित सफाई जैसी मूलभूत सुविधाओं के अभाव की शिकायतें सामने आ रही हैं।
बाहर से रंग-रोगन कर चमकते भवन सरकारी उपलब्धि की तस्वीर जरूर दिखाते हैं, लेकिन अंदर ग्रामीणों के उपयोग की सुविधा नहीं होने पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

आखिर शौचालय जनता के उपयोग के लिए बने हैं या सिर्फ सरकारी रिकॉर्ड में निर्माण पूर्ण दिखाने के लिए?
निर्माण पूरा होते ही खत्म हो गई जिम्मेदारी?
स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के तहत सामुदायिक स्वच्छता परिसरों का उद्देश्य उन लोगों को स्वच्छ शौचालय सुविधा उपलब्ध कराना है, जिनके पास घर में पर्याप्त स्थान या सुविधा नहीं है। ऐसे परिसरों को केवल बनाना ही पर्याप्त नहीं है। उनका नियमित संचालन, पानी, सफाई और रखरखाव भी जरूरी है।

सरकारी दिशा-निर्देशों में सामुदायिक स्वच्छता परिसरों के ऑपरेशन एवं मेंटेनेंस (O&M) की जिम्मेदारी ग्राम पंचायतों से जोड़ी गई है।
इसके बावजूद यदि किसी पंचायत का सामुदायिक शौचालय लंबे समय से बंद है तो सवाल सीधे पंचायत व्यवस्था पर उठता है।
क्या निर्माण के बाद किसी अधिकारी ने यह जांचने की जहमत उठाई कि शौचालय वास्तव में चल भी रहा है या नहीं?
पानी नहीं तो शौचालय किस काम का?
किसी भी शौचालय की सबसे बुनियादी जरूरत पानी है। लेकिन ग्रामीणों की शिकायत है कि कई स्थानों पर सामुदायिक शौचालयों में पर्याप्त पानी की व्यवस्था नहीं है।
ऐसे में भवन खड़ा कर देने से स्वच्छता का लक्ष्य कैसे पूरा होगा?
सरकारी दिशा-निर्देश भी सामुदायिक स्वच्छता परिसर के लिए पर्याप्त पानी की उपलब्धता और उसके दीर्घकालीन संचालन एवं रखरखाव की व्यवस्था पर जोर देते हैं।
पानी के बिना शौचालय और रखरखाव के बिना स्वच्छता परिसर—क्या यही है स्वच्छ भारत का मॉडल?
कहीं ताला, कहीं बदहाली
ग्रामीणों का कहना है कि कुछ स्थानों पर सामुदायिक शौचालयों में ताले लगे हुए हैं। जब जरूरतमंद ग्रामीण ही उसका उपयोग नहीं कर सकते तो ऐसे भवन का निर्माण किस उद्देश्य से किया गया, यह समझ से परे है।
कई जगहों पर शौचालयों की सफाई और रखरखाव को लेकर भी सवाल हैं।
यदि शौचालय खोलने के लिए चाबी किसी व्यक्ति के पास रहे, पानी उपलब्ध न हो और सफाई की व्यवस्था नियमित न हो तो ग्रामीण आखिर उसका इस्तेमाल कैसे करें?
सरकार ने शौचालय बनाया, लेकिन क्या उसे चलाने की व्यवस्था भी बनाई?
लाखों का निर्माण, उपयोगिता शून्य?
सामुदायिक स्वच्छता परिसरों के निर्माण के लिए सरकारी स्तर पर वित्तीय सहायता का प्रावधान है। लेकिन जनता के पैसे का वास्तविक मूल्य तभी है जब निर्मित परिसंपत्ति का नियमित उपयोग हो।
यदि निर्माण के बाद परिसर बंद पड़ा रहे तो यह सिर्फ एक निष्क्रिय भवन बनकर रह जाता है।
यहीं से सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है—
निर्माण की गुणवत्ता और पूर्णता की जांच तो होती है, लेकिन क्या उपयोगिता की भी जांच होती है?
कागजों में निर्माण पूर्ण, फोटो में चमकता भवन और जमीन पर बंद दरवाजा—अगर यही स्थिति है तो सिस्टम को जवाब देना होगा।
फोटो खिंचवाने से नहीं आएगी स्वच्छता
स्वच्छ भारत मिशन का असली उद्देश्य केवल शौचालयों का निर्माण कराना नहीं, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छता को स्थायी बनाना है।
शौचालय की दीवारों पर रंग, स्वच्छता का संदेश और सरकारी योजना का नाम लिख देने भर से गांव स्वच्छ नहीं हो जाता।
जब तक ग्रामीण उस सुविधा का इस्तेमाल न करें, तब तक निर्माण का असली उद्देश्य अधूरा है।
यही वजह है कि अब निर्माण की संख्या बताने के बजाय यह बताने की जरूरत है कि कितने सामुदायिक शौचालय चालू हालत में हैं।
अब होना चाहिए भौतिक सत्यापन
खरसिया जनपद क्षेत्र में सामुदायिक शौचालयों की वास्तविक स्थिति जानने के लिए प्रशासन को ग्राम पंचायतवार भौतिक सत्यापन कराना चाहिए।
जांच में यह स्पष्ट किया जाना चाहिए—
कितने सामुदायिक शौचालय बनाए गए?
इनमें से कितने वर्तमान में चालू हैं?
कितने में ताला लगा है?
कितने शौचालयों में नियमित पानी उपलब्ध है?
कितने परिसरों की नियमित सफाई होती है?
O&M के लिए किसे जिम्मेदारी दी गई है?
रखरखाव के लिए कितनी राशि खर्च की गई?
निर्माण के बाद कितने समय तक शौचालय नियमित रूप से संचालित हुआ?
क्या ग्रामीण वास्तव में इसका उपयोग कर रहे हैं?
बंद पड़े परिसरों को दोबारा शुरू करने के लिए क्या कार्रवाई की गई?
जिम्मेदारों से जवाब मांगने का समय
अब सिर्फ यह बताना पर्याप्त नहीं होगा कि “सामुदायिक शौचालय बना दिया गया है।”
जरूरत इस बात की है कि पंचायत और संबंधित विभाग यह बताएं कि—
“बनने के बाद वह कितने दिन चला?”
अगर किसी शौचालय में पानी नहीं है तो पानी की व्यवस्था क्यों नहीं की गई?
अगर ताला लगा है तो किसके आदेश से लगा है?
अगर सफाई नहीं होती तो O&M की जिम्मेदारी किसकी है?
अगर भवन खराब हो रहा है तो उसकी मरम्मत कौन करेगा?
और सबसे अहम—
जनता के पैसे से बनी सरकारी संपत्ति अगर जनता के ही उपयोग में नहीं आ रही है तो इसकी जवाबदेही किसकी है?
अब ‘निर्माण’ नहीं, ‘उपयोग’ का हिसाब चाहिए
खरसिया के ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छता अभियान की सफलता का पैमाना अब सिर्फ निर्मित शौचालयों की संख्या नहीं होना चाहिए। प्रशासन को यह देखना होगा कि जमीन पर कितने शौचालय वास्तव में कार्यशील हैं।
सरकारी योजना का पैसा खर्च हो गया, भवन खड़ा हो गया और फोटो भी खिंच गई—लेकिन अगर ग्रामीण सुविधा से वंचित हैं तो पूरी कवायद पर सवाल उठना लाजिमी है।
स्वच्छ भारत मिशन की सफलता रंगी हुई दीवारों में नहीं, इस्तेमाल होते हुए साफ-सुथरे शौचालयों में दिखाई देनी चाहिए।
खरसिया में अब जरूरत है फाइलों की नहीं, मौके पर जांच की।
जरूरत है निर्माण की नहीं, उपयोगिता की रिपोर्ट की।
और जरूरत है दावों की नहीं, जवाबदेही की।
प्रशासन यदि वास्तव में गांवों को स्वच्छ और खुले में शौच से मुक्त बनाए रखना चाहता है, तो खरसिया क्षेत्र के सभी सामुदायिक शौचालयों का तत्काल भौतिक सत्यापन कराकर बंद एवं अनुपयोगी परिसरों को चालू कराने की कार्रवाई करनी चाहिए।

