रायगढ़ :- लैलूंगा।गरीब और जरूरतमंद लोगों को निःशुल्क अंतिम यात्रा सुविधा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से जिला खनिज न्यास निधि (DMF) से उपलब्ध कराया गया शव वाहन अब खुद सवालों के घेरे में आ गया है। लैलूंगा शासकीय अस्पताल में संचालित यह शव वाहन इन दिनों गंभीर अनियमितताओं और मनमानी संचालन को लेकर चर्चाओं में है। क्षेत्र में लगातार ऐसी बातें सामने आ रही हैं कि जिस वाहन को आपातकालीन और निःशुल्क सेवा के लिए अस्पताल को दिया गया था, वह अब निजी स्वार्थ और कमाई का माध्यम बनकर रह गया है।
जानकारी के अनुसार कलेक्टर द्वारा DMF फंड से यह शव वाहन लैलूंगा अस्पताल को संचालन हेतु उपलब्ध कराया गया था। बाद में अस्पताल प्रबंधन द्वारा फंडिंग और संचालन व्यवस्था का हवाला देते हुए इसे एक निजी संस्था “मुक्तांजलि शव वाहन सेवा” को सौंप दिया गया। बताया जाता है कि इस संस्था का संचालन टोल फ्री नंबर 1099 के माध्यम से किया जाता है तथा वाहन के ड्राइवर, डीजल, मेंटेनेंस सहित संपूर्ण खर्च कंपनी द्वारा वहन किया जाता है।
लेकिन जमीनी हालात कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं।
अस्पताल में नहीं, ड्राइवर के घर में खड़ा रहता है शव वाहन
सूत्रों के अनुसार अस्पताल में संचालित शव वाहन अधिकांश समय अस्पताल परिसर में खड़ा रहने के बजाय चालक के निजी घर में खड़ा रहता है। जबकि नियम अनुसार ऐसी आपातकालीन सेवाओं वाले वाहन अस्पताल या निर्धारित सरकारी परिसर में उपलब्ध रहने चाहिए ताकि जरूरत पड़ने पर तत्काल सेवा दी जा सके।
आरोप यह भी है कि जब किसी अस्पताल में मृत्यु होती है या सड़क दुर्घटना, फांसी अथवा अन्य घटनाओं में शव को ले जाने की आवश्यकता पड़ती है, तब पीड़ित परिवारों से पहले दूरी पूछी जाती है और फिर मनमाना किराया बताया जाता है। यदि परिवार आर्थिक रूप से कमजोर हो और पैसे देने में असमर्थता जताए तो वाहन खराब होने का बहाना बना दिया जाता है। वहीं जो व्यक्ति चालक की मांग अनुसार रकम देने को तैयार हो जाए, उसके लिए वाहन तुरंत उपलब्ध करा दिया जाता है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यह खेल कोई नया नहीं बल्कि वर्षों से चलता आ रहा है, लेकिन शिकायतों के बावजूद कभी ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
सरकारी शव वाहन किनारे, निजी एम्बुलेंस का संचालन तेज
मामले में नया मोड़ तब आया जब यह चर्चा सामने आई कि शव वाहन का चालक स्वयं की निजी “ईको एम्बुलेंस” खरीद चुका है। आरोप है कि अब सरकारी शव वाहन घर में खड़ी रहती है और चालक अपनी निजी गाड़ी का संचालन प्राथमिकता से करता है। कई बार शवों को निजी वाहन से ले जाया जाता है और सरकारी शव वाहन का उपयोग केवल तब होता है जब एक साथ अधिक शव ले जाने की स्थिति बन जाए।
इसी के साथ यह गंभीर आरोप भी सामने आ रहे हैं कि सरकारी शव वाहन के लिए मिलने वाले ईंधन और संचालन राशि का दुरुपयोग किया जा रहा है। क्षेत्र में चर्चा है कि सरकारी तेल का उपयोग निजी वाहन में तक किया जा रहा है। हालांकि इन आरोपों की अब तक आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन लगातार उठ रहे सवाल पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर संदेह खड़ा कर रहे हैं।
GPS लगा होने के बावजूद निगरानी क्यों नहीं?
बताया जा रहा है कि शव वाहन में GPS सिस्टम भी लगा हुआ है, जिससे वाहन की लोकेशन, दूरी और उपयोग की जानकारी आसानी से ली जा सकती है। इसके बावजूद अब तक न तो किसी स्तर पर निगरानी की गई और न ही यह सार्वजनिक किया गया कि वाहन प्रतिदिन कितनी दूरी तय कर रहा है, कितना ईंधन खर्च हो रहा है और कितने शवों को सेवा दी गई।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि वाहन लगातार चालक के घर में खड़ा रहता है तो अस्पताल प्रबंधन द्वारा कभी आपत्ति क्यों नहीं की गई? क्या अस्पताल के जिम्मेदार अधिकारी यह पूछने की स्थिति में नहीं हैं कि सरकारी शव वाहन आखिर अस्पताल परिसर में क्यों नहीं रखा जा रहा?
क्या निजी कंपनी को संचालन सौंपने का मतलब मनमानी की खुली छूट?
लोगों के बीच यह सवाल भी तेजी से उठ रहा है कि यदि शव वाहन का संचालन किसी निजी कंपनी को सौंपा गया है तो क्या इसका मतलब यह है कि चालक अपनी मर्जी से वाहन का उपयोग करेगा? क्या उसके लिए कोई नियम-कायदे नहीं हैं? क्या अस्पताल प्रशासन की कोई जवाबदेही नहीं बनती?
सूत्रों का दावा है कि इस पूरे मामले में ऊपर तक मिलीभगत होने के कारण कोई कार्रवाई नहीं होती। यहां तक कि शव वाहन संचालन करने वाली कंपनी के कुछ जिम्मेदार लोगों तक हिस्सेदारी पहुंचने की चर्चाएं भी क्षेत्र में जोर पकड़ रही हैं। यही कारण बताया जा रहा है कि वाहन की वास्तविक स्थिति, उपयोग और खर्च का कोई पारदर्शी रिकॉर्ड सामने नहीं आता।
अस्पताल प्रबंधन की चुप्पी पर भी सवाल
इस पूरे मामले में अस्पताल प्रबंधन की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। यदि सरकारी वाहन का दुरुपयोग हो रहा है, वाहन अस्पताल परिसर से बाहर निजी उपयोग में रखा जा रहा है, सरकारी ईंधन का गलत इस्तेमाल हो रहा है और गरीबों से पैसे वसूले जा रहे हैं, तो आखिर जिम्मेदार अधिकारी मौन क्यों हैं?
क्षेत्र के लोगों का कहना है कि यह केवल एक वाहन का मामला नहीं बल्कि गरीबों के लिए शुरू की गई सरकारी व्यवस्था की विश्वसनीयता का प्रश्न है। यदि अंतिम यात्रा जैसी संवेदनशील सेवा भी भ्रष्टाचार और निजी स्वार्थ की भेंट चढ़ जाए तो आम जनता आखिर भरोसा किस पर करे?
अब देखने वाली बात होगी कि प्रशासन इस मामले को गंभीरता से लेकर जांच कराता है या फिर यह मामला भी अन्य शिकायतों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा।

